प्रविष्टि तिथि: 05 JUN 2026 11:35AM by PIB Delhi

किसान सशक्तिकरण के दायरे का विस्तार
पिछले 12 वर्षों में, भारत के कृषि क्षेत्र ने किसान सशक्तिकरण में व्यापक विस्तार देखा है। उत्पादकता, आय सुरक्षा, बाजार पहुंच, बुनियादी ढांचे और संस्थागत सुदृढ़ता को मजबूत करने की दिशा में कल्याणकारी सहायता से परे ध्यान केंद्रित किया गया है।
इस बदलाव में उच्च कृषि उत्पादन, विस्तारित सिंचाई, ऋण तक अधिक पहुंच, मजबूत बीमा कवरेज और संबद्ध क्षेत्रों में वृद्धि का बड़ा योगदान है। इसके साथ ही, विस्तारित एमएसपी संचालन और खरीद प्रणालियों ने बाजार आश्वासन को मजबूत किया है, लाभकारी मूल्य निर्धारण सुनिश्चित किया है और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा उद्देश्यों का समर्थन किया है। इसके अलावा, डिजिटल प्लेटफॉर्म, सहकारी समितियों, खाद्य प्रसंस्करण और जलवायु-अनुकूल पहलों ने कृषि मूल्य श्रृंखला में नए अवसर पैदा किए हैं। ये विकास एक अधिक विविध, प्रौद्योगिकी-संचालित और किसान-केंद्रित कृषि प्रणाली की ओर क्रमिक बदलाव को दर्शाते हैं।
भारत के कृषि क्षेत्र का उदय: विकास, निवेश और सुदृढ़ता
पिछले एक दशक में, निरंतर नीतिगत फोकस और सार्वजनिक निवेश में वृद्धि से भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में महत्वपूर्ण विस्तार देखा गया है। लक्षित कार्यक्रमों ने कृषि उत्पादन में वृद्धि, उत्पादकता में सुधार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती को बढ़ाने में योगदान दिया है।
कृषि और संबद्ध सकल मूल्य वर्धन में वृद्धि का एक दशक
कुल सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में कृषि और संबद्ध क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 18 प्रतिशत है। इस क्षेत्र का जीवीए 2014-15 में 20.9 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-2024 में 48.7 लाख करोड़ रुपये हो गया। इस अवधि के दौरान, इस क्षेत्र ने मौजूदा कीमतों पर 8.83 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) दर्ज की।
फसलों के उत्पादन में सुधार से भी इस विकास को मदद मिली है। फसलों का जीवीए वर्ष 2014-15 में यह 12,92,874 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 26,52,891 करोड़ रुपये हो गया।
कृषि के लिए बढ़ी हुई वित्तीय सहायता
इस अवधि में कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश में काफी वृद्धि हुई है। कृषि और किसान कल्याण विभाग के लिए बजटीय आवंटन 2013-14 में 27,663 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 के लिए 1,40,528.78 करोड़ रुपये हो गया। यह महत्वपूर्ण वृद्धि कृषि बुनियादी ढांचे में निरंतर नीतिगत समर्थन और निरंतर निवेश को दर्शाता है जिससे समग्र कृषि विस्तार को मजबूती मिली है।

खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोतरी की गति
कुल खाद्यान्न उत्पादन 2013-14 में 265.05 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 357.73 मिलियन टन हो गया है। यह वृद्धि चावल, गेहूं, मक्का और मोटे अनाज के उच्च उत्पादन से संभव हो सका है। इसमें मोटे अनाज भी शामिल रहे जिसे अब श्रीअन्न के रूप में प्रचारित किया गया है। इस वृद्धि को राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और पोषण मिशन (एनएफएसएनएम) से सहयोग मिला है। यह मिशन चावल, गेहूं, दालों और मोटे अनाज के उच्च उत्पादन को बढ़ावा देता है। इस मिशन में बेहतर बीजों, बेहतर कृषि पद्धतियों और प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है।

- 2024-25 में 150.18 मीट्रिक टन का रिकॉर्ड चावल उत्पादन हुआ, जो 2014-15 (105.48 मीट्रिक टन) की तुलना में 42.38 प्रतिशत अधिक है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल उत्पादक देश बन गया।
- 2024-25 में 117.94 मीट्रिक टन का उच्चतम गेहूं उत्पादन दर्ज किया गया, जो वर्ष 2014-15 के बाद से 36 प्रतिशत से अधिक है।
- मक्का का उत्पादन भी 2024-25 में 43.40 मीट्रिक टन तक पहुंच गया, जो 2014-15 (24.17 मीट्रिक टन) से लगभग 79 प्रतिशत की वृद्धि है।
तिलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में किए जा रहे प्रयास भी दिखाई दे रहे हैं। तिलहन ने 42.99 मीट्रिक टन (2024-25) का उच्चतम उत्पादन दर्ज किया, जो 2014-15 (27.51 मीट्रिक टन) की तुलना में 56 प्रतिशत अधिक है।
खाद्य तेल आयात निर्भरता 2015-16 में 63.2 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 56.25 प्रतिशत हो गई, जो क्रमिक प्रगति का संकेत है। इस अवधि के दौरान, तिलहन के रकबे में 18 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई। उत्पादन में लगभग 55 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि उत्पादकता में लगभग 31 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
बागवानी क्षेत्र भी कृषि विकास में एक प्रमुख योगदानकर्ता के रूप में उभरा है। यह फसल क्षेत्र के सकल मूल्य उत्पादन का लगभग 37 प्रतिशत है। उत्पादन 2013-14 में 280.70 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 369.05 मिलियन टन हो गया है। यह विस्तार उच्च मूल्य वाली फसलों की ओर विविधीकरण को इंगित करता है, जो बेहतर कृषि प्रथाओं और बाजार की मांग से संभव हो पाया है।
इन क्षेत्रीय सुधारों के साथ-साथ, उत्पादन प्रणालियों को मजबूत करने, किसानों का सहयोग करने और दीर्घकालिक लचीलापन बनाने के लिए कृषि नीति का लगातार विस्तार हुआ है।
सुधारों के लिए एक रोडमैप: भारत की कृषि नीति को मजबूत करना (2014-2026)
पिछले बारह वर्षों में, कृषि नीति ने सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य, बाजारों, जोखिम शमन और बुनियादी ढांचे में विस्तार किया है। केंद्रित पहलों की एक श्रृंखला ने इस परिवर्तन को एक अधिक एकीकृत और किसान-केंद्रित कृषि ढांचे की दिशा में आकार दिया है।
प्रारंभिक सुधार उत्पादकता और संसाधन दक्षता में सुधार पर केंद्रित थे। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) ने सिंचाई कवरेज का विस्तार किया और जल-उपयोग दक्षता को बढ़ावा दिया। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना ने वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन को सक्षम बनाया। राष्ट्रीय गोकुल मिशन ने गायों की देसी नस्लों और डेयरी उत्पादकता का समर्थन किया।
इसके बाद उत्पादन जोखिमों को कम करने और बाजार पहुंच में सुधार करने पर ध्यान केंद्रित किया गया। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) ने फसल बीमा कवरेज का विस्तार किया, जबकि ई-एनएएम ने डिजिटल कृषि व्यापार और व्यापक बाजार एकीकरण को सक्षम बनाया। 2018 के एमएसपी सुधार ने उत्पादन लागत का 1.5 गुना एमएसपी तय करके मूल्य आश्वासन को मजबूत किया।
बाद के वर्षों में किसानों की आय बढ़ाने में मदद और सामाजिक सुरक्षा पर अधिक जोर दिया गया। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) ने प्रत्यक्ष आय सहायता की शुरुआत की। प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (पीएम-केएमवाई) ने छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक पेंशन ढांचा तैयार किया है। कृषि अवसंरचना कोष (एआईएफ) और पीएम किसान संपदा योजना (पीएमकेएसवाई) ने फसल कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे और मूल्यवर्धन में निवेश बढ़ाया।
संस्थागत सुधारों और सहकारिता के नेतृत्व वाले विकास ने भी गति पकड़ी। सहकारिता मंत्रालय ने सहकारी शासन को मजबूत किया और सहकारिता आधारित आर्थिक गतिविधियों का विस्तार किया।
इसके अलावा, हाल की पहलों ने विविधीकरण और आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित किया है। खाद्य तेलों पर राष्ट्रीय मिशन- पाम ऑयल (एनएमईओ-ओपी) और खाद्य तेल-तिलहन पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमईओ-ओएस) ने घरेलू खाद्य तेल उत्पादन को बढ़ावा दिया। प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्रों (पीएमकेएसके) ने इनपुट और सलाहकार सेवाओं तक पहुंच में सुधार किया है। प्रधानमंत्री धन धान्य कृषि योजना (पीएम-डीडीकेवाई) जैसे नए कार्यक्रमों का उद्देश्य प्रमुख फसलों में उत्पादकता को मजबूत करना है। दलहन आत्मनिर्भरता मिशन आयात निर्भरता को कम करने और घरेलू उत्पादन में सुधार करने पर केंद्रित है।

भारतीय किसान को सशक्त बनाना: वित्तीय स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा
पिछले बारह वर्षों में, कृषि चक्र में सरकारी पहलों का विस्तार हुआ है, खेती और बीमा कवरेज से लेकर खरीद तक। इन कार्यक्रमों ने किसानों के लिए प्रत्यक्ष आय सहायता को भी मजबूत किया।
प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से किसानों की आय सहायता को संस्थागत बनाना
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) छोटे और सीमांत किसानों को सुनिश्चित आय सहायता प्रदान करती है। यह अनौपचारिक ऋण स्रोतों पर निर्भरता को कम करते हुए कृषि और घरेलू खर्चों को पूरा करना सुनिश्चित करता है।
इस योजना के तहत, प्रत्येक पात्र किसान परिवार को 6,000 रुपये की वार्षिक वित्तीय सहायता मिलती है। यह राशि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) व्यवस्था के माध्यम से 2,000 रुपये की तीन समान किस्तों में हस्तांतरित की जाती है।

अपनी स्थापना के बाद से मार्च 2026 तक, पीएम-किसान ने 22 किस्तों के माध्यम से 4.28 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वितरण किया है। इससे देश भर में 9.44 करोड़ से अधिक किसान परिवार लाभान्वित हुए हैं। इसका 25 प्रतिशत से अधिक लाभ महिला लाभार्थियों को मिले हैं, जो ग्रामीण परिवारों में योजना की समावेशी पहुंच को दर्शाता है।
यह योजना किसानों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी डीबीटी पहलों में से एक के रूप में उभरी है। यह लाभार्थियों को सीधे आय सहायता प्रदान करने के लिए बड़े पैमाने पर संस्थागत व्यवस्था को दर्शाता है।
फसल बीमा और जोखिम न्यूनीकरण के जरिए फसल को सुरक्षित करना
कृषि सूखे, बाढ़, चक्रवात, कीटों के हमलों और अन्य प्राकृतिक अनिश्चितताओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनी हुई है। इस तरह के जोखिम किसानों के महत्वपूर्ण आय हानि का कारण बन सकते हैं और कृषि निरंतरता को बाधित कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) से किसानों को एक सरल, सस्ती और व्यापक फसल बीमा प्रणाली मिलती है। पीएमएफबीवाई में पूरा फसल चक्र शामिल होता है, जिसमें बुवाई से पहले और कटाई के बाद के नुकसान शामिल हैं। यह योजना "एक राष्ट्र, एक फसल, एक प्रीमियम" के सिद्धांत का पालन करती है, जो पूरे देश में एक समान प्रीमियम दरें सुनिश्चित करती है।
पीएमएफबीवाई के तहत शिकायत निवारण तंत्र को मजबूत करने के लिए, कृषि रक्षक पोर्टल और हेल्पलाइन (केआरपीएच) नंबर 14447 लॉन्च किया गया है। शिकायत निवारण तंत्र को देश भर में लगभग 500 अधिकारी चलाते हैं।

इस योजना के तहत सालाना 4 करोड़ से अधिक किसानों का बीमा किया जाता है, जो किसानों के बीच इसकी व्यापक पहुंच और बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाता है। 2016-17 से अब तक 92.46 करोड़ किसानों के आवेदनों का बीमा किया गया है। 31 दिसंबर 2025 तक 1.96 लाख करोड़ रुपये के दावों का वितरण किया गया है, जिससे लगभग 24.31 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं। इस प्रकार, अनिश्चितताओं से निपटने और कृषि गतिविधियों को अधिक लचीलेपन और आत्मविश्वास के साथ जारी रखने की किसानों की क्षमता को बढ़ाया जाता है।
कृषि खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य में दशकीय वृद्धि
न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) कृषि उपज के लिए पूर्व-निर्धारित मूल्य सुनिश्चित करके एक सुरक्षा के रूप में कार्य करता है। 22 अनिवार्य फसलों के लिए सालाना एमएसपी की घोषणा की जाती है। 2018-19 से एमएसपी उत्पादन लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक तय किया गया है।
एमएसपी मदद के साथ-साथ सार्वजनिक खरीद में काफी विस्तार हुआ। एमएसपी दरों पर गेहूं, धान, दलहन, तिलहन और कपास जैसी फसलों की सार्वजनिक खरीद से किसानों को उनकी आय बढ़ान में मदद मिलती है। कुल खरीद 2004-2014 के दौरान 698.7 मिलियन टन से बढ़कर 2014-2026 के दौरान 1,229.2 मिलियन टन हो गई । इसमें करीब 76 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2014-2026 (फरवरी 2026 तक) तक कुल एमएसपी मूल्य 26.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। पिछले दशक यानी 2004-2014 के दौरान 7.41 लाख करोड़ रुपये की तुलना में यह 3.5 गुना अधिक है। यह वृद्धि किसानों के लिए उपलब्ध बाजार समर्थन के पैमाने को दर्शाती है।

खरीफ फसलों में, रागी ने 2014-15 के बाद से 236 प्रतिशत की उच्चतम एमएसपी वृद्धि दर्ज की। इसके बाद नाइजरसीड 179 प्रतिशत और ज्वार (हाइब्रिड) 163 प्रतिशत पर रहा। रबी और वाणिज्यिक फसलों में जूट में 147 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि मसूर में 128 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। ये रुझान विभिन्न फसल श्रेणियों में सुनिश्चित मूल्य निर्धारण को मजबूत करने के निरंतर प्रयासों को दर्शाते हैं।
विपणन सीजन 2026-27 के लिए सभी खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य:
विपणन सीजन 2026-27 के लिए सभी रबी और वाणिज्यिक फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य:
फसलों के एमएसपी में लगातार वृद्धि किसानों के लिए आय समर्थन को मजबूत करने के निरंतर प्रयासों को दर्शाती है।
संस्थागत कृषि ऋण की वृद्धि
किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) योजना के माध्यम से समय पर और किफायती ऋण तक पहुंच में सुधार हुआ है। यह योजना किसानों को कृषि और संबद्ध गतिविधियों में उनकी अल्पकालिक और निवेश आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एकल खिड़की प्रदान करती है।
सितंबर 2025 तक, ऑपरेटिव केसीसी खातों की संख्या 2013-2014 में 6.46 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में 7.81 करोड़ हो गई है। इन खातों में राशि मार्च 2014 में 4.26 लाख करोड़ रुपये से दोगुनी होकर मार्च 2025 में 10.20 लाख करोड़ रुपये हो गई।
यह किसानों के बीच संस्थागत ऋण पहुंच के पैमाने को दर्शाता है। इस योजना के दायरे में खेती का खर्च, कटाई के बाद की आवश्यकताएं और विपणन शामिल हैं।

इसके अलावा, ग्राउंड लेवल क्रेडिट (जीएलसी) बैंकों और वित्तीय संस्थानों से कृषि और संबद्ध क्षेत्रों को केन्द्रित ऋण सहायता प्रदान करता है। कृषि के लिए जीएलसी प्रवाह 2013-2014 में 7.30 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2024-2025 में 28.67 लाख करोड़ रुपये हो गया। यह कृषि क्षेत्र के लिए संस्थागत वित्त के संरचनात्मक विस्तार को इंगित करता है।
किसानों के लिए समावेशी सामाजिक सुरक्षा को आगे बढ़ाना
प्रधानमंत्री किसान मानधन योजना (पीएम-केएमवाई) छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक पेंशन-आधारित सामाजिक सुरक्षा ढांचा प्रदान करती है। यह योजना 60 वर्ष की आयु के बाद 3,000 रुपये की मासिक पेंशन प्रदान करती है, जो पात्रता शर्तों के अधीन है। यह योजना स्वैच्छिक और अंशदायी है, जिसमें 18 से 40 वर्ष की आयु के लोग पात्र हैं।
फरवरी 2026 तक, लगभग 24.95 लाख किसानों को इस योजना के तहत नामांकित किया गया है। यह किसानों के बीच सामाजिक सुरक्षा कवरेज के क्रमिक विस्तार को दर्शाता है।
संसाधन दक्षता और स्थिरता की ओर कदम
पानी, मिट्टी, बीज और ऊर्जा संसाधनों का कुशल प्रबंधन कृषि विकास का केंद्र बन गया है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) ने सिंचाई कवरेज और जल दक्षता को मजबूत किया है। वित्त वर्ष 2016-21 के बीच सिंचाई क्षेत्र का कवरेज कुल फसली क्षेत्र के 49.3 प्रतिशत से बढ़कर 55 प्रतिशत हो गया।
बीज और रोपण सामग्री पर उप मिशन (एसएमएसपी) प्रमाणित बीजों की आपूर्ति का विस्तार करने पर केंद्रित है। इस पहल के तहत, लगभग 6.85 लाख बीज गांव स्थापित किए गए हैं, जिससे 1,649 लाख क्विंटल गुणवत्ता वाले बीजों का उत्पादन किया गया है।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड (एसएचसी) योजना के तहत किसानों को मिट्टी के पोषक तत्वों के बारे में जानकारी मिलती है और उर्वरक के उपयोग के बारे में मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है। 2014-15 से, मार्च 2026 तक लगभग 26 करोड़ कार्ड जारी किए गए हैं, जिससे मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन का लगातार विस्तार हो रहा है। देश भर में 8,313 मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएं इस काम में लगी हैं। इसके अलावा, 70,000 से अधिक कृषि सखियों को मृदा स्वास्थ्य सलाह प्रदान करने और सूचित कृषि पद्धतियों का समर्थन करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है।
हाल के वर्षों में टिकाऊ कृषि पद्धतियों को महत्व मिला है। परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से जैविक खेती को बढ़ावा देती है। पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए जैविक मूल्य श्रृंखला विकास मिशन (एमओवीसीडीएनईआर) पूर्वोत्तर क्षेत्र में जैविक उत्पादन और बाजार संपर्कों का समर्थन करता है।
दिसंबर 2025 तक, पीकेवीवाई के तहत 18.84 लाख हेक्टेयर को शामिल किया गया है, जिससे 33.93 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं। एमओवीसीडीएनईआर के तहत, 2015-16 में इसकी स्थापना के बाद से 2.36 लाख हेक्टेयर को कवर किया गया है, जिसमें 2.70 लाख किसानों की मदद की गई है।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (एनएमएनएफ) मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार और इनपुट लागत को कम करने के लिए रसायन मुक्त कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देता है। अब तक, इस योजना ने 9 लाख हेक्टेयर को कवर किया है और 19 लाख किसानों को पंजीकृत किया है।
इसके अतिरिक्त, 2014-2025 के दौरान 2,996 जलवायु-अनुकूल फसल किस्में जारी की गई हैं। सरकार ने 448 गांवों में जलवायु-लचीले ग्राम मॉडल को भी बढ़ावा दिया, जिससे कृषि और संबद्ध क्षेत्रों के 8.5 लाख किसानों को लाभ हुआ। एकीकृत कृषि प्रणाली (आईएफएस) का विस्तार 79 जिलों में 1.04 लाख किसान परिवारों तक किया गया था। इन कार्यक्रमों से कृषि आय बढ़कर 1.5-3.6 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर सालाना हो गई।
नवीकरणीय ऊर्जा भी कृषि विकास का हिस्सा बन गई है। 2019 में शुरू की गई प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम कुसुम) खेती में सौर ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा देता है। यह सौर पंपों को बढ़ावा देता है और किसानों को बिजली पैदा करने और बेचने में सक्षम बनाता है।
हाल के वर्षों में इस योजना में महत्वपूर्ण विस्तार देखा गया है। 2025 के मध्य तक, किसानों के लिए सौर पंप 92 गुना से अधिक बढ़ गए हैं, जो किसानों के बीच इसकी लोकप्रियता का संकेत देते हैं। दिसंबर 2025 तक, इस योजना के तहत 21.77 लाख से अधिक किसान लाभान्वित हुए हैं। 10 लाख से अधिक स्टैंडअलोन सौर कृषि पंप स्थापित किए गए हैं। ग्रिड से जुड़े 13 लाख से अधिक कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से युक्त किया गया है।

ये प्रयास कुशल और टिकाऊ कृषि की ओर क्रमिक बदलाव को दर्शाते हैं। बेहतर सिंचाई, बेहतर इनपुट और स्वच्छ ऊर्जा समाधानों ने संसाधनों का संरक्षण करते हुए उत्पादकता को बढ़ाया है।
लक्षित सुधारों के माध्यम से खाद्य वितरण प्रणाली को बढ़ावा
वितरण प्रणालियों में सुधार और लक्षित क्षेत्रीय कार्यक्रमों ने खराब प्रदर्शन करने वाले क्षेत्रों में पहुंच, पारदर्शिता और समावेशन को मजबूत करने में मदद की है। 2025 में शुरू की गई, प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (पीएमडीडीकेवाई) में ऐसे 100 कृषि जिले शामिल हैं जहां कम उत्पादन होता है। यह योजना सिंचाई, फसल विविधीकरण, फसल कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे और ऋण तक बेहतर पहुंच पर केंद्रित है। अप्रैल 2026 तक, इस पहल से 1.7 करोड़ किसान लाभान्वित हो चुके हैं जिससे जमीनी स्तर पर परिणाम देखने को मिलते हैं।
खाद्यान्न वितरण की दक्षता में सुधार करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को सुदृढ़ किया गया है। यह पात्र परिवारों के लिए रियायती दर वाले खाद्यान्नों तक समय पर पहुंच भी सुनिश्चित करता है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत, लगभग 79.8 करोड़ लाभार्थियों को सब्सिडी वाले खाद्यान्न प्रदान किए जाते हैं। इसके अलावा, सार्थक पीडीएस – (पीडीएस में स्वचालन के साथ राशन परिवहन और हैंडलिंग आय में सहायता के लिए योजना) के तहत, केंद्र सरकार अगले 5 वर्षों में 25,530 करोड़ रुपये आवंटित करेगी। यह योजना खाद्यान्न वितरण प्रणालियों को मजबूत करेगी और देश भर में लगभग 81.35 करोड़ लाभार्थियों तक एनएफएसए का लाभ पहुंचाएगी।
इस योजना का उद्देश्य खाद्यान्न वितरण प्रणालियों को मजबूत करना और देश भर में लगभग 81.35 करोड़ लाभार्थियों के लिए एनएफएसए के प्रभावी कार्यान्वयन में मदद करना है।
वन नेशन वन राशन कार्ड (ओएनओआरसी) प्रणाली सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है। लगभग 99.9 प्रतिशत राशन कार्ड प्रणाली के तहत आधार से जुड़े हैं। लगभग 99.8 प्रतिशत उचित मूल्य की दुकानें इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट-ऑफ-सेल उपकरणों से लैस हैं। देश भर में लगभग 5.50 लाख दुकानें शामिल हैं। इस प्रणाली के तहत 98 प्रतिशत से अधिक लेनदेन को डिजिटल किया जा चुका है। इस प्रकार, वितरण में इन सुधारों ने पारदर्शिता और पोर्टेबिलिटी में सुधार किया है।
सहकारी और एफपीओ सुधारों के माध्यम से ग्रामीण संस्थानों को सशक्त बनाना
हाल के वर्षों में सहकारी क्षेत्र पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित किया गया है। 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना के बाद संस्थानों और सहकारी समितियों की क्षमता को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। लक्षित प्रयास प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पीएसीएस) की कार्यक्षमता और पारदर्शिता में सुधार करके उन्हें मजबूत करना है। साक्ष्य-आधारित योजना का समर्थन करने के लिए पीएसीएस सहित 8.4 लाख से अधिक सहकारी समितियों को कवर करने वाला एक राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस (एनसीडी) विकसित किया गया है।
मॉडल उप-नियमों को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ साझा किया गया है, जिससे पीएसीएस को 25 से अधिक व्यावसायिक गतिविधियों में विविधता लाने में सक्षम बनाया गया है। इन गतिविधियों में पेट्रोल पंप, एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटरशिप, जन औषधि केंद्र और ग्रामीण सेवाएं शामिल हैं। ये सुधार जवाबदेही बढ़ा रहे हैं, परिचालन दायरे का विस्तार कर रहे हैं और सहकारी संस्थानों की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार कर रहे हैं।
डिजिटलीकरण ने पीएसीएस कम्प्यूटरीकरण परियोजना के माध्यम से सहकारी संस्थाओं को और मजबूत किया है। सोसायटी को एक सामान्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने से पारदर्शिता, दक्षता और जमीनी स्तर पर सेवा वितरण में सुधार हुआ है।
- 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कम्प्यूटरीकरण के लिए 79,630 पीएसीएस स्वीकृत किए गए।
- मार्च 2026 तक एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ईआरपी) आधारित राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर पर 61,866 पैक्स शामिल किए गए।
इसके अलावा, 10,000 किसान-उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के गठन और प्रचार के लिए कार्यक्रम ने सामूहिक भागीदारी का विस्तार किया है। 2020 में एफपीओ शुरू किए गए थे। फरवरी 2026 तक, 10,000 एफपीओ पंजीकृत किए गए हैं। इससे किसानों को उपज एकत्र करने और बाजारों तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचने में मदद मिली है।
यह विकास यात्रा संगठित और संस्था-नेतृत्व वाली कृषि की ओर एक व्यापक बदलाव को उजागर करता हैं। मजबूत किसान समूह और सहकारी समितियां बेहतर बाजार भागीदारी और दीर्घकालिक स्थिरता का समर्थन कर रही हैं।
खेत से बाजार तक: कृषि बुनियादी ढांचे को मजबूत करना
हाल के वर्षों में, बाजार पहुंच और बुनियादी ढांचे में सुधार पर खास फोकस रहा है। 2020-21 में शुरू किया गया कृषि अवसंरचना कोष (एआईएफ) फसल कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे में निवेश को बढ़ावा देता है। यह खेत के पास ही भंडारण, लॉजिस्टिक्स और प्रसंस्करण पर ध्यान केंद्रित करता है। मार्च 2026 तक, एआईएफ के अंतर्गत 168 लाख परियोजनाओं के लिए 84,202 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं। इस योजना ने ग्रामीण बुनियादी ढांचे को मजबूत करते हुए 1.33 लाख करोड़ रुपये का निवेश भी जुटाया है।
राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम) ने बाजार एकीकरण में सुधार किया है। इससे किसानों को कृषि वस्तुओं के व्यापार के लिए एक एकीकृत इलेक्ट्रॉनिक मंच मिलती है। मार्च 2026 तक, 1,656 मंडियों को एकीकृत किया गया है, जिसमें 1.80 करोड़ से अधिक किसान और 4,724 एफपीओ पंजीकृत हैं। यह प्लेटफॉर्म पारदर्शी मूल्य खोज और किसानों को सीधे भुगतान करने में सक्षम बनाता है।
भौतिक और सेवा बुनियादी ढांचे का भी विस्तार हुआ है। 2022 में शुरू किए गए प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र (पीएमकेएसके) इनपुट और सलाहकार सेवाओं के लिए वन-स्टॉप सेंटर के रूप में कार्य करते हैं। अगस्त 2025 तक, देश भर में लगभग 1.8 लाख केंद्र स्थापित किए गए हैं।
मेगा फूड पार्क योजना ने किसानों और बाजारों के बीच संबंधों को मजबूत किया है। मेगा फूड पार्कों की संख्या 2014 में 2 से बढ़कर 2025 में 41 हो गई है, जिसमें 24 चालू और 17 कार्यान्वयन के अधीन हैं। ये पार्क प्रसंस्करण, भंडारण और लॉजिस्टिक्स के लिए आधुनिक बुनियादी ढांचा प्रदान करते हैं। बेहतर बुनियादी ढांचे, डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रसंस्करण क्षमता से किसानों की दक्षता बढ़ी है और उनके लिए बेहतर आय के अवसर भी बने हैं।
खाद्य प्रसंस्करण सुधारों के जरिए कृषि और उद्योग को जोड़ना
खाद्य प्रसंस्करण कृषि और उद्योग के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभरा है। यह मूल्यवर्धन का समर्थन करता है और बाजार पहुंच में सुधार करता है। इस क्षेत्र ने सकल मूल्य वर्धन में 2014-15 में 1.34 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 2.24 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय के लिए बजट आवंटन 2014-15 में 785.86 करोड़ रुपये से बढ़कर 2026-27 में 4,064 करोड़ रुपये हो गया। यह क्षेत्र रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण (एएसआई), 2023-24 के अनुसार यह संगठित विनिर्माण रोजगार का 12.83 प्रतिशत है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन योजना (पीएलआईएसएफपीआई) 2021-22 से 2026-27 तक लागू की जा रही है। यह योजना क्षेत्र में 10,900 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ क्षमता विस्तार और मूल्यवर्धन को बढ़ावा देती है।
- पीएलआईएसएफपीआई के तहत, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा विभिन्न श्रेणियों में कुल 165 आवेदनों को मंजूरी दी गई है।
- ये अनुमोदन 274 परियोजना स्थानों के अनुरूप हैं।
- लाभार्थियों ने इस योजना के तहत 9,207 करोड़ रुपये के निवेश की सूचना दी है।
- फरवरी 2026 तक 2,162.55 करोड़ रुपये प्रोत्साहन के रूप में वितरित किए जा चुके हैं।
2020-21 में शुरू की गई प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना (पीएमएफएमई) सूक्ष्म उद्यमों और विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण को बढ़ावा देती है।
31 दिसंबर 2025 तक:
- 4,04,062 आवेदनों को सहायता
- 1,72,707 ऋणों की सुविधा प्रदान की गई
- 14,190 करोड़ रुपये का सावधि ऋण दिया गया
- महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को 1,277.45 करोड़ रुपये की प्रारंभिक पूंजी सहायता
इन पहलों के अलावा, बड़े पैमाने पर प्रसंस्करण बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना (पीएमकेएसवाई) बुनियादी ढांचे, मूल्यवर्धन और आपूर्ति श्रृंखलाओं का समर्थन करती है। 2017 में 6,520 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ शुरू की गई इस योजना ने 1,607 परियोजनाओं को मंजूरी दी है। इससे 7.25 लाख लोगों को रोजगार मिला और 2025 के मध्य तक 50.27 लाख से अधिक किसान लाभान्वित हुए हैं।
कृषि विविधीकरण और संबद्ध क्षेत्रों का विकास
संबद्ध क्षेत्रों में विविधीकरण ने कृषि आय को मजबूत किया है और अकेले फसल आधारित आय पर निर्भरता कम की है। संबद्ध क्षेत्रों में पशुधन, मत्स्य पालन और डेयरी शामिल हैं, जो आय के कई स्रोत प्रदान करते हैं और ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा देते हैं।

अर्थव्यवस्था में इन क्षेत्रों का योगदान लगातार बढ़ा है। इसी अवधि के दौरान पशुधन क्षेत्र 5.10 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 15.06 लाख करोड़ रुपये हो गया। मत्स्य पालन और जलीय कृषि क्षेत्र का भी विस्तार हुआ। जीवीए में 1.17 लाख करोड़ रुपये से 3.68 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुए जो कृषि और संबद्ध जीवीए का 7.55 प्रतिशत है।
ग्रामीण आर्थिक विकास के चालक के रूप में पशुधन और डेयरी
पशुधन क्षेत्र ने 2014-15 से 12.77 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (सीएजीआर) दर्ज की है। भारत वैश्विक स्तर पर दूध का सबसे बड़ा उत्पादक बना हुआ है, जो वैश्विक उत्पादन में लगभग 25 प्रतिशत का योगदान देता है। दूध उत्पादन 2014-15 में 146.31 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 247.87 मिलियन टन हो गया, जो 69.4 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि को दर्शाता है। बेहतर उपलब्धता ने पोषण परिणामों को बेहतर किया है। 2024-25 में प्रति व्यक्ति दूध की उपलब्धता 485 ग्राम प्रति दिन तक पहुंच गई, जबकि वैश्विक औसत 328 ग्राम प्रति दिन है।
उत्पादकता लाभ ने इस विस्तार का समर्थन किया है:
- देसी मवेशियों की उत्पादकता 2014-15 में 927 किलोग्राम से बढ़कर 2023-24 में 1,292 किलोग्राम हो गई।
- भैंस की उत्पादकता 1,880 किलोग्राम से बढ़कर 2,161 किलोग्राम हो गई।
- कुल मिलाकर गोजातीय उत्पादकता 2013-14 में 1,648.17 किलोग्राम से बढ़कर 2024-25 में 2,079 किलोग्राम हो गई।

पोल्ट्री और मांस उत्पादन में भी विस्तार हुआ है। भारत विश्व स्तर पर अंडा उत्पादन में दूसरे और मांस उत्पादन में चौथे स्थान पर है:
- अंडा उत्पादन 2014-15 में 78.48 बिलियन से बढ़कर 2024-25 में 149.11 बिलियन अंडा हो गया।
- प्रति व्यक्ति उपलब्धता 62 से बढ़कर 106 अंडे प्रति वर्ष हो गई।
- मांस उत्पादन 6.69 मिलियन टन से बढ़कर 10.50 मिलियन टन हो गया।
जलीय कृषि विस्तार से मत्स्य पालन समूहन तक
एक दशक के दौरान, भारत के मत्स्य पालन क्षेत्र ने 8.74 प्रतिशत की निरंतर औसत वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है। कुल मछली उत्पादन 2013-14 में 9.58 मिलियन टन से बढ़कर 2024-25 में 19.78 मिलियन टन हो गया। अंतर्देशीय मत्स्य पालन और जलीय कृषि इस विस्तार के प्राथमिक चालक रहे हैं। इसी अवधि के दौरान, इस क्षेत्र ने 147 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की, जो 6.14 मिलियन टन से 15.16 मिलियन टन हो गई। इसके अलावा, मात्स्यिकी क्षेत्र में, 2,195 किसान मात्स्यिकी उत्पादक संगठनों (एफएफपीओ) के गठन के माध्यम से मत्स्य पालन सामूहिकता को मजबूत किया गया है। किसान क्रेडिट कार्ड योजना के तहत 4.39 लाख मछुआरों को कवर करने के साथ संस्थागत सहायता का भी विस्तार हुआ है। इससे ऋण तक पहुंच में सुधार हुआ है और क्षेत्रीय लचीलापन बढ़ा है।

मधुमक्खी पालन और जैव ऊर्जा में उभरते अवसर
राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन (एनबीएचएम): 2020 में शुरू किया गया राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन वैज्ञानिक मधुमक्खी पालन और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देता है। शहद उत्पादन 0.081 मिलियन टन से बढ़कर 0.152 मिलियन टन हो गया है। साथ ही, निर्यात में 240 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जिससे भारत एक प्रमुख शहद निर्यातक देश बन गया।
इथेनॉल सम्मिश्रण पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम: जैव-ऊर्जा कृषि विविधीकरण के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में उभरी है। यह ऊर्जा सुरक्षा में योगदान करते हुए किसानों की आय को बढ़ाने में योगदान करता है।
इथेनॉल एक कृषि आधारित ईंधन है जो गन्ने के उप-उत्पादों और खाद्यान्न से उत्पादित होता है। इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल कार्यक्रम आयात निर्भरता को कम करने और घरेलू उत्पादन का समर्थन करने के लिए पेट्रोल के साथ इसके सम्मिश्रण को बढ़ावा देता है।
पिछले एक दशक में इस कार्यक्रम का काफी विस्तार हुआ है:
- इथेनॉल की खरीद 2013-14 में 38 करोड़ लीटर से बढ़कर 2024-25 में 904 करोड़ लीटर हो गई।

- ईबीपी कार्यक्रम के तहत सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) द्वारा पेट्रोल के साथ मिश्रित इथेनॉल का औसत प्रतिशत ईएसवाई 2025-26 (जनवरी 2026 तक) के लिए बढ़कर 20 प्रतिशत हो गया, जो 2014-15 में 1.14 प्रतिशत था।
- चीनी मिलों ने पिछले एक दशक में इथेनॉल की बिक्री से 1.29 लाख करोड़ रुपये से अधिक की आय अर्जित की।
- इस क्षेत्र में 42,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश जुटाया गया है।
यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि जैव-ऊर्जा पहल व्यापक ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हुए आय विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है।
कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात के माध्यम से वैश्विक एकीकरण को बढ़ाना
कृषि और संबद्ध निर्यात ने वैश्विक बाजारों के साथ भारत के एकीकरण को मजबूत किया है। उत्पादन, प्रसंस्करण क्षमता और बाजार पहुंच में वृद्धि ने इस विस्तार को बढ़ावा दिया है।
कृषि निर्यात का मूल्य 2013-14 में 37.29 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 51.1 बिलियन डॉलर हो गया। इसमें करीब 37 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। यह वैश्विक व्यापार और मूल्य श्रृंखलाओं के साथ भारतीय कृषि के निरंतर एकीकरण को दर्शाता है।
निर्यात बास्केट में विविधता लाना
निर्यात बास्केट का विस्तार प्राथमिक और प्रसंस्कृत दोनों उत्पादों में हुआ है। भारत चावल, मसाले, समुद्री उत्पादों, कपास और चीनी का शीर्ष वैश्विक निर्यातक बन गया है।

प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात ने समय के साथ कृषि निर्यात का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त किया है। उनकी हिस्सेदारी 2014-15 में 13.7 प्रतिशत से बढ़कर 2024-25 में 20.4 प्रतिशत हो गई, जो लगभग 49 प्रतिशत की वृद्धि है। यह बढ़ते मूल्यवर्धन और बेहतर वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को दर्शाता है।
इस बास्केट में समुद्री निर्यात में भी मजबूत वृद्धि देखी गई है। समुद्री खाद्य निर्यात 2013-14 में 3.64 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2024-25 में लगभग 7.52 बिलियन डॉलर हो गया। इसमें करीब 106 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ये निर्यात अब 130 से अधिक देशों तक पहुंच गए हैं, जिससे वैश्विक समुद्री खाद्य बाजारों में भारत की उपस्थिति और भी मजबूत हो गई है।
ये तथ्य अधिक विविध और मूल्य वर्धित निर्यात बास्केट की ओर बदलाव का संकेत देते हैं। कृषि निर्यात तेजी से प्राथमिक वस्तुओं से आगे बढ़कर प्रसंस्कृत और उच्च मूल्य वाले उत्पादों की ओर बढ़ रहा है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म और सटीक प्रौद्योगिकियों के माध्यम से कृषि का आधुनिकीकरण
प्रौद्योगिकी तेजी से कृषि पद्धतियों को नया आकार दे रही है। डिजिटल सिस्टम योजना में सुधार कर रहे हैं, सेवा वितरण को मजबूत कर रहे हैं और किसानों को समय पर जानकारी पहुंचाने में मदद कर रहे हैं।
डिजिटल कृषि मिशन: डिजिटल कृषि मिशन कृषि के लिए एक एकीकृत डिजिटल परितंत्र बना रहा है। यह लक्ष्यीकरण और पारदर्शिता में सुधार के लिए किसान डेटाबेस, भूमि रिकॉर्ड और फसल की जानकारी को एकीकृत करता है।
यह विस्तार डिजिटलीकरण के पैमाने में दिखाई दे रहा है। फरवरी 2026 तक, 7.63 करोड़ से अधिक किसान आईडी बनाए गए हैं, और लगभग 23.5 करोड़ फसल भूखंडों का डिजिटलीकरण किया गया है। ये सिस्टम बेहतर योजना को बढ़ावा देते हैं और लाभों के अधिक सटीक वितरण को सक्षम करते हैं।
नमो ड्रोन दीदी: 2023 में शुरू की गई यह पहल, महिला एसएचजी द्वारा कृषि कार्यों के लिए ड्रोन के उपयोग को बढ़ावा देती है। इस योजना को 2023-24 से 2025-26 की अवधि के लिए 1,261 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ अनुमोदित किया गया था।
इस योजना के तहत 2023-24 में 500 ड्रोन वितरित किए गए। यह योजना ड्रोन आधारित आजीविका के अवसरों और आधुनिक कृषि तकनीक के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बना रही है।
राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली: राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली कीट हमलों की तत्क्षण निगरानी को बढ़ावा देती है। यह प्रारंभिक चेतावनी और सलाह प्रदान करने के लिए डिजिटल टूल और क्षेत्र-स्तरीय डेटा का उपयोग करती है।
अगस्त 2024 में शुरू की गई, इस प्रणाली के तहत 66 फसलों को शामिल किया गया है और 432 से अधिक कीट प्रजातियों की निगरानी की जाती है। इसका उपयोग 10,000 से अधिक क्षेत्रीय अधिकारी करते हैं ताकि किसानों को समय पर सलाह दी जा सके। इससे फसल के नुकसान को कम करने में मदद मिलती है और उभरते जोखिमों से तेजी से निपटा जाता है।
किसान ई-मित्र: किसान ई-मित्र किसानों को योजनाओं और सेवाओं की जानकारी तक डिजिटल पहुंच प्रदान करता है। मार्च 2026 तक, इस प्लेटफॉर्म ने 95 लाख से अधिक प्रश्नों का समाधान किया है, जिसकी दैनिक क्षमता 8,000 से अधिक प्रश्नों की है। यह सेवा 11 क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है, जिससे सभी क्षेत्रों के किसानों को उनके सवालों का समाधान मिलता है। ये लक्षित पहल प्रौद्योगिकी-संचालित कृषि की दिशा में क्रमिक परिवर्तन को दर्शाती हैं। डिजिटल उपकरण परिचालन दक्षता में सुधार कर रहे हैं, संस्थागत पहुंच का विस्तार कर रहे हैं और सेवाओं, सूचना तथा जोखिम प्रबंधन तंत्र तक तेजी से पहुंच को सक्षम कर रहे हैं।
ज्ञान-संचालित विकास: कृषि विस्तार और सलाहकार सेवाओं को बढ़ाना
जैसे-जैसे कृषि तेजी से प्रौद्योगिकी-संचालित और जलवायु-संवेदनशील होती जा रही है, किसानों की ज्ञान प्रणालियों को मजबूत करना तेजी से महत्वपूर्ण हो गया है। प्रशिक्षण और विस्तार कार्यक्रम किसानों को बेहतर प्रथाओं को अपनाने, स्थानीय चुनौतियों का जवाब देने और वैज्ञानिक सलाहकार सहायता प्राप्त करने में मदद कर रहे हैं।
कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके): भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) द्वारा स्थापित कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), देश भर में अग्रिम पंक्ति के किसान-प्रशिक्षण केंद्रों के रूप में कार्य करते हैं। 731 केवीके के माध्यम से, कृषि पद्धतियों और प्रौद्योगिकी अपनाने पर प्रशिक्षण कार्यक्रम 2021-22 और 2023-24 के बीच लगभग 58.02 लाख किसानों तक पहुंचे। अकेले 2024-25 के पहले दस महीनों में 18.56 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया गया।
कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए): कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी विकेंद्रीकृत कृषि विस्तार प्रणालियों को बढ़ावा देती है। यह जिला स्तरीय किसान सलाहकार सेवाओं को मजबूत करने पर केंद्रित है।
इस योजना के तहत प्रशिक्षण कवरेज पर्याप्त बना हुआ है। 2021-22 में लगभग 32.38 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया गया। इसके बाद 2022-23 में 40.11 लाख और 2023-24 में 36.60 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया गया। जनवरी 2025 तक, लगभग 18.30 लाख किसानों को प्रशिक्षित किया गया था।
कुल मिलाकर, 2021 और 2025 के बीच लगभग 1.27 करोड़ किसानों को एटीएमए के तहत प्रशिक्षित किया गया है। इन प्रयासों से जागरूकता में सुधार हुआ है और बेहतर प्रथाओं को अपनाया गया है।
इसके अलावा, विस्तार सेवाएं किसानों को बेहतर प्रथाओं को अपनाने और बदलती परिस्थितियों का जवाब देने में मदद कर रही हैं। वे अनुसंधान और क्षेत्र-स्तरीय कार्यान्वयन के बीच की कड़ी को भी मजबूत कर रहे हैं।
एक सुदृढ़ और एकीकृत कृषि परितंत्र की ओर आगे बढ़ना
लक्षित कार्यक्रम भारत के कृषि क्षेत्र में एक संरचनात्मक परिवर्तन पर जोर देते हैं। नीतिगत सुधार तेजी से उत्पादकता, आय स्थिरता और जोखिम शमन पर केंद्रित हैं। बढ़े हुए उत्पादन और संस्थागत प्रभावकारिता के साक्ष्य एक अधिक लचीले परितंत्र की ओर संक्रमण को दर्शाते हैं। इसे ऋण, बीमा, विस्तारित एमएसपी संचालन और डिजिटल बुनियादी ढांचे तक बेहतर पहुंच से मदद मिलती है।
एकीकृत मूल्य श्रृंखलाओं में रणनीतिक निवेश ने खेत-से-बाजार संबंधों में बेहतर तालमेल बनाया है। साथ ही, संबद्ध गतिविधियों के विस्तार ने ग्रामीण आजीविका को प्रभावी ढंग से विविध बनाया है। इसके अलावा, ये कार्यक्रम अधिक लचीले, समावेशी और टिकाऊ कृषि क्षेत्र की नींव रखते हुए अन्नदाताओं को सशक्त बना रहे हैं।

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