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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, भारत ने 'डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी से मानवाधिकारों की सुरक्षा' विषय पर हाइब्रिड मोड में एक खुली चर्चा का आयोजन किया|

 


राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने चर्चा की अध्यक्षता करते हुए कहा कि साइबर-फ्रॉड लोगों के अधिकारों, गरिमा और सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है

सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने डिजिटल फ्रॉड से जुड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए मौजूदा प्रक्रियाओं में कमियों के बारे में बात की

सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी ने कहा कि एहतियाती कदम उठाना सिर्फ तकनीक और विनियमन का मामला नहीं है, बल्कि यह सुशासन की ज़िम्मेदारी भी है

महासचिव श्री भरत लाल ने कहा कि साइबर अपराधी डेटा लीक और अन्य स्रोतों से मिले पर्सनल डेटा का इस्तेमाल करके कमज़ोर लोगों को निशाना बना रहे हैं, जो डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है

विभिन्न सुझावों में, डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी को मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत एक अलग अपराध के तौर पर मान्यता देने पर जोर दिया गया, ताकि जांच, अभियोजन और पीड़ित को न्याय दिलाने की प्रक्रिया को ज़्यादा असरदार बनाया जा सके

प्रविष्टि तिथि: 09 JUN 2026 7:48PM by PIB Delhi

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी), भारत ने आज नई दिल्ली के मानव अधिकार भवन में 'डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी से मानवाधिकारों की सुरक्षा' विषय पर हाइब्रिड मोड में एक खुली चर्चा का आयोजन किया। चर्चा की अध्यक्षता करते हुए, अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने साइबर-फ्रॉड, विशेष रूप से डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी से बढ़ते खतरे पर प्रकाश डाला और लोगों के अधिकारों, गरिमा और सुरक्षा पर इनके गंभीर असर के बारे में भी बात की। इस चर्चा में एनएचआरसी के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी और श्रीमती विजया भारती सयानी; महासचिव श्री भरत लाल; महानिदेशक (जांच) श्रीमती अनुपमा नीलेकर चंद्रा; संयुक्त सचिव श्री समीर कुमार; कोर ग्रुप के सदस्यों, विशेष प्रतिवेदकों, विशेष मॉनिटर; भारत सरकार के विभिन्न प्रमुख विभागों -जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, दूरसंचार मंत्रालय, दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई), भारतीय रिजर्व बैंक, सीबीआई, नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया- के वरिष्ठ अधिकारी; जाने-माने कानूनी और विषय-विशेषज्ञ; तथा दूरसंचार ऑपरेटरों और बैंकिंग व फिनटेक संघों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

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एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यन ने इस समस्या से निपटने के लिए मिलकर काम करने पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि पिछले छह वर्षों में भारतीयों को साइबर फ्रॉड की वजह से लगभग 52,976 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जिसमें से लगभग 8 प्रतिशत नुकसान डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी के कारण हुआ है। यह डेटा भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के आधार पर इकट्ठा किया है। उन्होंने गौर किया कि कई रिपोर्ट किए गए मामलों में, धोखाधड़ी करने वालों ने लोगों के मन में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के डर का फायदा उठाकर उन्हें पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर किया।

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उन्होंने यह भी बताया कि पीड़ितों के लिए अपनी रकम का कुछ हिस्सा भी वापस पाना बहुत मुश्किल होता है, क्योंकि कानूनी और प्रक्रियात्मक काम लंबे, महंगे और परेशान करने वाले साबित होते हैं। कभी-कभी, पैसे वापस पाने की प्रक्रिया पैसे गंवाने की प्रक्रिया से भी ज़्यादा तकलीफदेह होती है। अध्यक्ष ने यह भी कहा कि देश में लाखों म्यूल अकाउंट की खबरें है, जो धोखाधड़ी से प्राप्त धन के हस्तांतरण को सुगम बनाते हैं। पीड़ितों की सुरक्षा और उनके अधिकारों की रक्षा पर ज़ोर देते हुए, उन्होंने ऐसी धोखाधड़ी को रोकने के लिए व्यावहारिक सुझाव मांगे। उन्होंने कहा कि कानूनी ढांचे की कमियों को पहचानकर और उन्हें दूर करके, कानून प्रवर्तन एजेंसियों के काम करने के तरीके को बेहतर बनाकर और डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी से निपटने के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (एसओपी) बनाकर रिकवरी के तरीकों को बेहतर बनाना, पीड़ितों की आर्थिक सुरक्षा बहाल करना और उन्हें जीवन में उनका सम्मान और मानसिक शांति वापस पाने में मदद करना आवश्यक होगा। उन्होंने नागरिकों को डिजिटल धोखाधड़ी से बचाने के लिए लंबे समय तक चलने वाली ओटीटी कॉल पर अलर्ट जैसे तरीकों पर विचार करने का भी सुझाव दिया।

एनएचआरसी के सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी ने कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी की चुनौतियों से निपटने के मौजूदा तरीकों में कुछ कमियां हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि इस तरह की चर्चाओं से जल्द ही व्यावहारिक समाधान निकालने में मदद मिलेगी। सदस्य श्रीमती विजया भारती सयानी ने इस बात पर जोर दिया कि नागरिकों को साइबर अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी से बचाना राजधर्म का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। एहतियाती कदम उठाना सिर्फ तकनीक और विनियमन का मामला नहीं है, बल्कि यह सुशासन की ज़िम्मेदारी भी है। इसलिए, हमारा सामूहिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति इस तरह की धोखाधड़ी का शिकार न बने।

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इससे पहले, एनएचआरसी के महासचिव श्री भरत लाल ने अपने उद्घाटन संबोधन में 'डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी से मानवाधिकारों की सुरक्षा' पर खुली चर्चा का आयोजन करने की पृष्ठभूमि के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि साइबर अपराध ज़्यादातर बुज़ुर्गों को प्रभावित करते हैं, जिनमें सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी, पेशेवर, उद्योगपति और बैंकर शामिल हैं। इससे न सिर्फ़ उन्हें आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि उनकी गरिमा, आत्म-सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। एक संबंधित मामले में सुप्रीम कोर्ट को दी गई जानकारी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले साल बुज़ुर्गों को निशाना बनाने वाले ऐसे 3,000 से अधिक धोखाधड़ी के मामले दर्ज किए गए थे।

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उन्होंने कहा कि साइबर अपराधी पीड़ितों को निशाना बनाने के लिए डेटा लीक और अन्य स्रोतों से मिले पर्सनल डेटा का गलत इस्तेमाल कर रहे हैं, जो डेटा प्राइवेसी और सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है। डिजिटल गवर्नेंस और फाइनेंशियल सिस्टम में हो रहे बदलावों की वजह से वे धोखाधड़ी कर पाते हैं और पकड़े जाने के डर के बिना तेज़ी से पैसे इधर-उधर कर पाते हैं। उन्होंने कमज़ोर वर्गों खासकर बुज़ुर्गों की सुरक्षा के लिए उपाय मज़बूत करने और साइबर धोखाधड़ी के पीड़ितों को प्रभावी सहायता और समाधान सुनिश्चित करने पर जोर दिया।

श्री लाल ने कहा कि आयोग ने आगे का रास्ता खोजने के लिए इस विषय को चर्चा के लिए तीन तकनीकी सत्रों में बांटा। ये हैं: क.) डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी में वृद्धि के कारणों और प्रभावी कार्रवाई में आने वाली बाधाओं की पहचान करना, .) डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी से निपटने के लिए बचाव के उपाय तैयार करना, और ग) शिकायत निवारण, मुआवज़ा और पीड़ितों की मदद करने के तंत्र को बेहतर बनाना। उन्होंने विशेषज्ञों से इन पहलुओं पर राय साझा करने का अनुरोध किया ताकि आयोग अपनी प्रतिक्रिया दे सके।

डिजिटल धोखाधड़ी को रोकने की सरकार की कोशिशों के बारे में जानकारी देते हुए, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री अजीत कुमार ने बताया कि एक अंतर-विभागीय समिति डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी से निपटने के लिए रोकथाम से लेकर मुआवज़े तक के उपायों को तलाश रही है। उन्होंने यह भी बताया कि आईटी एक्ट की धारा 47 के तहत विवादों के निपटारे और मुआवज़े की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए एक पोर्टल बनाया जा रहा है। साथ ही, उन्होंने भरोसा व्यक्त किया कि डीपीडीपी फ्रेमवर्क लागू होने से नागरिकों के डेटा की सुरक्षा मज़बूत होगी और डेटा से जुड़ी चिंताओं को दूर करने में मदद मिलेगी।

भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) की पुलिस महानिरीक्षक सुश्री रूपा एम. ने cybercrime.gov.in पोर्टल, हेल्पलाइन 1930 और सीएफसीएफआरएमएस  प्लेटफ़ॉर्म के बारे में बताया, जिनका इस्तेमाल पीड़ितों के पैसे का पता लगाने, उसे रोकने और वापस दिलाने के लिए किया जाता है। उन्होंने सरकारी लोगो, सिम बॉक्स और म्यूल अकाउंट के गलत इस्तेमाल के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई करने की भी बात कही। एनएचआरसी के विशेष मॉनिटर श्री मुक्तेश चंदर ने सिम कार्ड और बैंक खातों को विनियमित करने, धोखाधड़ी करने वालों द्वारा पैदा किए गए मानसिक डर से निपटने, साइबर धोखाधड़ी के मामलों में एफआईआर दर्ज करने और पीड़ित को दोषी ठहराने के बजाय पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। महाराष्ट्र के एडीजी श्री बृजेश सिंह ने साइबर अपराध को डेटा चोरी, म्यूल नेटवर्क और एआई की मदद से बड़े पैमाने पर होने वाला अपराध बताया। उन्होंने ऑटोमेटेड गोल्डन-ऑवर इंटरवेंशन, एक नेशनल साइबर क्राइम फ़ोर्स, डीपीडीपी को सख़्ती से लागू करने, पीड़ित को मुआवज़ा देने और मानसिक सहायता देने की वकालत की।

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भारतीय रिजर्व बैंक के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के मुख्य महाप्रबंधक श्री आर. वनराजा ने डिजिटल अरेस्ट से जुड़े अपराधों में पैटर्न की पहचान करने और अलर्ट जारी करने में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की क्षमता पर जोर दिया और सरकार के एक ही कम्युनिकेशन चैनल का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया। उन्होंने बैंक खातों के गलत इस्तेमाल के बारे में लोगों में जागरूकता बढ़ाने और असली उपयोगकर्ता की सुविधा का ध्यान रखते हुए धोखाधड़ी रोकने के उपायों के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया। आईबीए के वरिष्ठ सलाहकार श्री राजीव रंजन प्रसाद ने डिजिटल धोखाधड़ी को रोकने के लिए बैंकिंग इंडस्ट्री द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में बताया। इनमें एआई-आधारित म्यूल अकाउंट की पहचान, बेनिफिशियरी अकाउंट नेम लुकअप फैसिलिटी और प्रस्तावित इंडियन डिजिटल पेमेंट इंटेलिजेंस प्लेटफ़ॉर्म शामिल हैं। उन्होंने कमज़ोर वर्ग के ग्राहकों द्वारा किए जाने वाले बड़े ट्रांज़ैक्शन के लिए अतिरिक्त ऑथेंटिकेशन की सुविधा देने के उद्देश्य से आरबीआई के 'ट्रस्टेड पर्सन' मैकेनिज़्म के प्रस्ताव का भी उल्लेख किया।

एनपीसीआई के चीफ रिस्क मैनेजमेंट श्री रमेश कृष्णमूर्ति ने ग्राहकों को शिक्षित करने के लिए एनपीसीआई के प्रयासों के बारे में बताया। इसमें जागरूकता अभियान, गांवों तक पहुंच, एआई-आधारित धोखाधड़ी की निगरानी और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को वास्तविक समय में सहायता देना शामिल है। उन्होंने कहा कि डिजिटल धोखाधड़ी से निपटने के लिए सभी हितधारकों को मिलकर काम करने की ज़रूरत है।

दूरसंचार विभाग के उप महानिदेशक (एआई और डिजिटल इंटेलिजेंस यूनिट) श्री संजीव कुमार शर्मा ने 'संचार साथी' पहल, एआई-आधारित टूल्स, इंटरनेशनल कॉल स्पूफिंग का पता लगाने और डिजिटल इंटेलिजेंस प्लेटफ़ॉर्म जैसे बचाव के उपायों के बारे में बताया। उन्होंने साइबर धोखाधड़ी को रोकने के लिए ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म के कड़े विनियमन, वास्तविक समय में डेटा शेयरिंग और शिकायतों को एफआईआर में बदलने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर ज़ोर दिया। सीबीआई की पुलिस अधीक्षक  सुश्री आस्था मोदी ने कहा कि बड़े पैमाने पर होने वाली डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी दक्षिण-पूर्व एशिया में साइबर स्कैम सेंटर्स से शुरू होती हैं और इन्हें म्यूल अकाउंट्स, टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर, सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज और मानव तस्करी के ज़रिए चलाया जाता है। उन्होंने म्यूल अकाउंट नेटवर्क, टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर, सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज और मानव तस्करी नेटवर्क के ख़िलाफ़ सीबीआई की कार्रवाई के बारे में बताया तथा सीबीआई के नोटिस और समन के सत्यापन के लिए एआई-आधारित चैटबॉट का उल्लेख किया।

ट्राई के संयुक्त सलाहकार श्री अशोक कुमार ने वॉयस कॉल, मैसेज और वीडियो कॉल के लिए इस्तेमाल होने वाले ओटीटी कम्युनिकेशन प्लेटफॉर्म को एक उपयुक्त नियामक तंत्र के दायरे में लाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। उन्होंने बताया कि ज़्यादातर डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी अब ओटीट चैनलों पर होने लगी है। उन्होंने डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी को रोकने के लिए बहुत लंबी कॉल के दौरान अलर्ट या रुकावट जैसे उपाय भी सुझाए। साइबर पीस फाउंडेशन के फाउंडर और ग्लोबल प्रेसिडेंट मेजर विनीत कुमार ने सरकार,उद्योग, अकादमिक जगत, सिविल सोसाइटी और नागरिकों की मिली-जुली ज़िम्मेदारी वाले मॉडल की वकालत की और प्रशिक्षित 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर्स' की एक 'ह्यूमन फायरवॉल' बनाने की बात कही। उन्होंने साइबर अपराध के शिकार लोगों के लिए मानसिक सहायता और पहली बार साइबर अपराध करने वालों और नाबालिगों के लिए सुधार के उपायों पर भी जोर दिया।

 

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सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री एन. एस. नप्पिनाई ने डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी से जुड़े मानवाधिकार पहलुओं पर प्रकाश डाला, जिनमें मानव तस्करी, निजता, जीवन और आज़ादी का हनन और मानसिक आघात शामिल हैं। उन्होंने सुधारात्मक न्याय, पीड़ितों के प्रतिपूर्ति के अधिकारों और साझा दायित्व के ढांचे पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. पवन दुग्गल ने कहा कि मौजूदा कानूनों के तहत डिजिटल अरेस्ट कोई विशिष्ट अपराध नहीं है और उन्होंने इसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 या भारतीय न्याय संहिता के तहत एक अलग अपराध के तौर पर शामिल करने का सुझाव दिया। उन्होंने उच्च मूल्य के लेन-देन के लिए वैधानिक 'सर्किट ब्रेकर', डिजिटल अरेस्ट पीड़ित फंड, डिजिटल अरेस्ट को मानवाधिकार के मुद्दे के तौर पर मान्यता देने और ऐसी धोखाधड़ी से होने वाले गरिमा, निजता और मानसिक शांति के हनन से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने की भी मांग की।

एयरटेल के चीफ रेगुलेटरी ऑफिसर श्री राहुल वत्स ने बताया कि 97-98 प्रतिशत ग्राहकों को आधार केवाईसी के माध्यम से जोड़ा जाता है, जिसमें बिक्री केंद्रों (पीओएस) पर लाइव फ़ोटो और बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण का इस्तेमाल होता है। उन्होंने एआई के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया, जिससे 14 अलग-अलग भाषाओं में संदिग्ध स्पैम कॉल और एसएमएस की पहचान की जा सके, धोखाधड़ी वाले लिंक का पता लगाकर उन्हें ब्लॉक किया जा सके, और कॉल के दौरान ओटीपी साझा किए जाने पर अलर्ट जारी किया जा सके।

एनएचआरसी की महानिदेशक (आई) श्रीमती अनुपमा नीलेकर चंद्रा ने कहा कि ड्रग और मानव तस्करी के साथ-साथ साइबर अपराध भी एक नई समस्या के तौर पर उभरा है, जिसमें एक अरब से ज़्यादा मोबाइल यूज़र्स को डिजिटल धोखाधड़ी का खतरा हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि एनएचआरसी कानूनी खामियों, अलग-अलग एजेंसियों के बीच तालमेल, क्षमता निर्माण, और पीड़ितों के पुनर्वास व मुआवज़े जैसे मुद्दों की जांच के लिए विषय-आधारित उप-समिति बना सकता है।

चर्चा से प्राप्त कुछ अन्य सुझाव निम्नलिखित हैं:

डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी को मौजूदा कानूनी ढांचे के तहत एक अलग अपराध के रूप में मान्यता दी जा सकती है, ताकि जांच, अभियोजन और पीड़ित को राहत दिलाने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।

म्यूल अकाउंट किराए पर देने, जबरन अपराध के लिए तस्करी और धोखाधड़ी के उद्देश्य से सरकारी लोगो का गलत इस्तेमाल करने को स्पष्ट रूप से अपराध घोषित करके कानूनी ढांचे को मजबूत किया जा सकता है।

जबरन फंड ट्रांसफर को रोकने के लिए स्वचालित सुरक्षा उपायों, जैसे कि ट्रांज़ैक्शन ‘सर्किट ब्रेकर’, ट्रस्टेड पर्सन ऑथेंटिकेशन, संदिग्ध ट्रांज़ैक्शन को कुछ समय के लिए रोकना और लंबी कॉल के दौरान अलर्ट भेजने जैसे तरीकों पर विचार किया जा सकता है।

पीड़ितों की मदद और पुनर्वास की प्रक्रियाओं को आसान बनाना चाहिए, ताकि प्रक्रिया में होने वाली देरी और परेशानियों को कम किया जा सके।

धोखाधड़ी से निपटने और उसे रोकने के लिए, डिजिटल इकोसिस्टम के सभी क्षेत्रों—वित्तीय संस्थानों, टेलीकॉम ऑपरेटरों, मध्यस्थों और सेवा प्रदाताओं—में जवाबदेही को और कड़ा किया जा सकता है।

पीड़ितों को राहत दिलाने और मध्यस्थों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत न्यायिक तंत्र को मजबूत किया जा सकता है।

जिन पीड़ितों को काफी आर्थिक और मानसिक नुकसान हुआ है, उनके लिए विशेष मुआवज़े और सहायता के तरीकों पर विचार किया जा सकता है।

लेन-देन के तरीकों का विश्लेषण और संबंधित हितधारकों के बीच जानकारी साझा करके, संभावित पीड़ितों को पहले से पहचानने और उन्हें सचेत करने वाली प्रणालियां विकसित की जा सकती हैं।

नागरिकों को कानून प्रवर्तन क्रेडेंशियल्स, नोटिस और सूचनाओं की प्रमाणिकता जांचने के लिए एक ही सरकारी कम्युनिकेशन चैनल या सत्यापन पोर्टल पर विचार किया जा सकता है।

साइबर-आधारित धोखाधड़ी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक और सिंथेटिक आइडेंटिटी जैसी उभरती हुई तकनीकों के दुरुपयोग से निपटने के लिए विशेष उपायों की जरूरत है।
डिजिटल अरेस्ट की धोखाधड़ी के निशाने पर रहने वाले बुजुर्गों और अन्य कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए कड़े सुरक्षा उपाय विकसित किए जाने चाहिए।
विभिन्न देशों में सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय साइबर अपराध नेटवर्क और साइबर धोखाधड़ी के ठिकानों को ध्वस्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को मजबूत किया जाना चाहिए।

जन जागरूकता अभियानों को धोखेबाजों द्वारा अपनाए जाने वाले व्यवहार-हेरफेर के तरीकों पर केंद्रित होना चाहिए, जैसे कि प्रतिरूपण, डराना-धमकाना और अधिकार या पद के प्रति विश्वास का फायदा उठाना।

कानून प्रवर्तन एजेंसियों, वित्तीय संस्थानों और फ्रंटलाइन कर्मियों के लिए बेहतर प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि रोकथाम, जांच और पीड़ितों की मदद की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जा सके।

एक ऐसी तंत्र स्थापित करना ताकि डेटा संबंधी अनुरोधों, समन और कंटेंट हटाने की कार्रवाई के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को इंटरमीडियरीज़ (मध्यस्थों) के शिकायत अधिकारियों और अनुपालन अधिकारियों की संपर्क जानकारी समय पर मिल सके।

आयोग केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी सिफ़ारिशों को अंतिम रूप देने के लिए इन सुझावों पर और विचार-विमर्श करेगा।