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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘कुष्ठ रोग-मुक्त भारत’ के लिए रणनीतियों को सुदृढ़ बनाने हेतु क्षेत्रीय कार्यशाला का आयोजन किया|The Union Health Ministry organized a regional workshop to strengthen strategies for a ‘Leprosy-free India’.

 

भारत ने कुष्ठ रोग के खिलाफ उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन स्थानिक क्षेत्रों में प्रयासों को और तेज़ करने की आवश्यकता है: श्रीमती आराधना पटनायक

कुष्ठ रोग के प्रसार को रोकने के लिए समय-समय पर केस डिटेक्शन अभियान और एसडीआर कवरेज का विस्तार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं: एएस एंड एमडी

क्षेत्रीय कार्यशाला का समापन ‘कुष्ठ रोग-मुक्त भारत’ हासिल करने के लिए राज्य-विशिष्ट रोडमैप के साथ हुआ

प्रविष्टि तिथि: 12 JUN 2026 5:06PM by PIB Delhi

‘कुष्ठ रोग-मुक्त भारत’ के सपने को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर में कुष्ठ रोग के शून्य संचरण को प्राप्त करने के लिए कार्यक्रम प्रदर्शन की समीक्षा और केंद्रित रणनीतिक कार्रवाई पर दो दिवसीय क्षेत्रीय कार्यशाला का आयोजन किया।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में अपर सचिव एवं मिशन निदेशक (राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन) श्रीमती आराधना पटनायक ने कुष्ठ रोग के बोझ को कम करने में भारत की उल्लेखनीय उपलब्धियों पर प्रकाश डाला और याद दिलाया कि देश ने 2005 में राष्ट्रीय स्तर पर एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में इस बीमारी का उन्मूलन हासिल कर लिया था। हालांकि, उन्होंने कहा कि कई स्थानिक जिलों और हॉटस्पॉट क्षेत्रों में संक्रमण अभी भी जारी है, जिसके लिए संक्रमण को पूरी तरह से रोकने के लिए गहन और लक्षित हस्तक्षेपों की आवश्यकता है।

शीघ्र निदान और त्वरित उपचार के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने स्थानिक क्षेत्रों में समय-समय पर कुष्ठ रोग मामलों की पहचान अभियान चलाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने संपर्क ट्रेसिंग को मजबूत करने और विशेष रूप से संवेदनशील और दुर्गम आबादी में संक्रमित मामलों के पात्र स्वस्थ संपर्कों के बीच एकल खुराक रिफैम्पिसिन (एसडीआर) के माध्यम से पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीईपी) के कवरेज का विस्तार करने का भी आह्वान किया। राज्यों को संपर्क स्क्रीनिंग और पीईपी कवरेज बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते हुए उन्होंने कहा कि ये उपाय रोग संचरण को कम करने और नए संक्रमणों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

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सुश्री पटनायक ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि पर्याप्त प्रगति हासिल की गई है, अब चुनौती शेष स्थानिक क्षेत्रों में प्रगति को बनाए रखने और कार्रवाई में तेजी लाने में है। जवाबदेही, समयबद्ध निर्णय लेने और प्रभावी कार्यक्रम क्रियान्वयन पर बल देते हुए उन्होंने राज्यों से नियमित रूप से प्रगति की समीक्षा करने, क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं की पहचान करने और सुधारात्मक उपाय करने का आग्रह किया। उन्होंने कार्यक्रम क्रियान्वयन को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन ढांचे के तहत क्षमता निर्माण, सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) गतिविधियों और समन्वय के महत्व पर प्रकाश डाला।

उन्होंने कुष्ठ रोग की बेहतर जांच और शीघ्र निदान के लिए सामुदायिक आधारित मूल्यांकन चेकलिस्ट (सीबीएसी), राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) और राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरकेएसके) जैसे प्लेटफार्मों का उपयोग करने की वकालत की। उन्होंने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत उपलब्ध फ्लेक्सी-पूल संसाधनों के प्रभावी उपयोग के लिए राज्य और जिला कुष्ठ रोग अधिकारियों को मार्गदर्शन भी दिया और सभी भागीदार राज्यों से शून्य संचरण के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में गति बनाए रखने का आह्वान किया।

महामारी विज्ञान संबंधी परिदृश्य पर प्रकाश डालते हुए सुश्री पटनायक ने प्रतिभागियों को सूचित किया कि पांच उच्च प्राथमिकता वाले राज्य - महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और मध्य प्रदेश - मिलकर भारत में कुष्ठ रोग के लगभग 50 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। उन्होंने बताया कि इन राज्यों में प्रति 10,000 जनसंख्या पर एक से अधिक मामले दर्ज करने वाले जिलों की संख्या भी काफी अधिक है, जिनमें छत्तीसगढ़ के 23 जिले, झारखंड के 21 जिले, महाराष्ट्र और ओडिशा के 18-18 जिले और मध्य प्रदेश के 10 जिले शामिल हैं।

उन्होंने आगे कहा कि जहां अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने कुष्ठ रोग उन्मूलन का दर्जा हासिल कर लिया है, वहीं छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और चंडीगढ़ अभी भी उप-राष्ट्रीय स्तर पर उन्मूलन लक्ष्य प्राप्त करने से पीछे हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शून्य संचरण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राज्यों के बीच मजबूत सहयोग, साक्ष्य-आधारित योजना, गहन निगरानी, ​​सर्वोत्तम प्रथाओं का आदान-प्रदान और इस बीमारी से जुड़े कलंक और भेदभाव को समाप्त करने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक होंगे।

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इस अवसर पर बोलते हुए कुष्ठ रोग विभाग के उप-महानिदेशक डॉ. सुनील वी. गिट्टे ने बताया कि 2025-26 के दौरान भारत में कुष्ठ रोग के 91,783 नए मामले सामने आए, जिनकी प्रसार दर प्रति 10,000 जनसंख्या पर 0.56 थी। नए मामलों में से 4.18 प्रतिशत बच्चे थे और निदान के समय 2.12 प्रतिशत में ग्रेड-2 विकलांगता पाई गई।

विकलांगता निवारण एवं पुनर्वास के क्षेत्र में जारी प्रयासों पर प्रकाश डालते हुए डॉ. गिट्टे ने प्रतिभागियों को सूचित किया कि कुष्ठ रोग से प्रभावित व्यक्तियों के लिए 1,591 पुनर्निर्माण शल्यक्रियाएं की जा चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, विकलांगता निवारण और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए 1.03 लाख से अधिक माइक्रो सेलुलर रबर (एमसीआर) के जूते और 1.25 लाख से अधिक स्व-देखभाल किट वितरित किए गए हैं। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि सक्रिय निदान, गहन संपर्क निगरानी, ​​संक्रमण के बाद की रोकथाम, समय पर उपचार, विकलांगता निवारण, पुनर्वास सेवाएं और सामुदायिक जागरूकता राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम (एनएलईपी) के महत्वपूर्ण स्तंभ बने हुए हैं। उन्होंने उन जिलों के लिए लक्षित रणनीतियां भी प्रस्तुत कीं, जहां इस रोग के प्रसार की दर प्रति 10,000 जनसंख्या पर एक से अधिक है, बाल रोगियों का अनुपात और नए रोगियों में ग्रेड-2 विकलांगता की दर ज्यादा है।

कार्यशाला के दौरान प्रतिभागी राज्यों ने कार्यक्रम के प्रदर्शन की विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत की, जिसमें नए मामलों का पता लगाने, उपचार पूरा करने, संपर्क ट्रेसिंग और फॉलो-अप, विकलांगता रोकथाम और चिकित्सा पुनर्वास सेवाओं तथा आईईसी पहलों के रुझान शामिल थे। राज्यों ने नवीन पद्धतियों और सफल फील्ड मॉडलों का भी प्रदर्शन किया, जिनसे रोगी पहचान, उपचार अनुपालन, समुदायिक सहभागिता तथा विकलांगता में कमी लाने में मदद मिली है।

तकनीकी सत्रों में भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों, सहभागी राज्यों के प्रतिनिधियों, विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों, तकनीकी संस्थानों और विकास भागीदारों के बीच व्यापक विचार-विमर्श हुआ। चर्चाओं में ज़िला-विशिष्ट चुनौतियों और साक्ष्य-आधारित सूक्ष्म नियोजन, सुदृढ़ निगरानी, ​​सामुदायिक भागीदारी में वृद्धि, कलंक-निवारण, सामाजिक और व्यवहार परिवर्तन संचार तथा उपचार अनुपालन में सुधार के माध्यम से कार्यक्रम परिणामों को बेहतर बनाने के व्यावहारिक समाधानों पर ध्यान केंद्रित किया गया।

कार्यशाला का समापन राज्य-विशिष्ट कार्य योजनाओं के निर्माण और सहभागी राज्यों द्वारा उच्च-स्थानिकता वाले जिलों में हस्तक्षेपों को और तेज करने की नई प्रतिबद्धता के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने विश्वास व्यक्त किया कि भारत सरकार, राज्य सरकारों, तकनीकी संस्थानों, विकास भागीदारों और समुदायों के समन्वित प्रयासों से कुष्ठ रोग-मुक्त, विकलांगता-मुक्त और संचरण-मुक्त भारत के साझा विजन को प्राप्त करने की दिशा में प्रगति में उल्लेखनीय तेजी आएगी।

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इस कार्यशाला की अध्यक्षता केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में अपर सचिव एवं मिशन निदेशक (राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन) श्रीमती आराधना पटनायक ने की। इसमें छत्तीसगढ़ सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव श्री अमित कटारिया; छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के आयुक्त-सह-निदेशक, स्वास्थ्य सेवा एवं मिशन निदेशक श्री संजीव कुमार झा; केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री निखिल गजराज तथा उप-महानिदेशक (कुष्ठ रोग) डॉ. सुनील वी. गिट्टे सहित विभिन्न राज्यों के मिशन निदेशक, राज्य कुष्ठ रोग अधिकारी, क्षेत्रीय निदेशक और वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी उपस्थित थे।

इस कार्यशाला में राज्य और जिला कुष्ठ रोग अधिकारियों, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों, जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के प्रतिनिधियों, केंद्रीय एवं क्षेत्रीय कुष्ठ रोग प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थानों के निदेशकों, कार्यक्रम प्रबंधकों, तकनीकी विशेषज्ञों और विकास भागीदारों सहित लगभग 200 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इनमें अंतर्राष्ट्रीय कुष्ठ रोग निरोधक संघ (आईएलईपी) और सासाकावा-इंडिया कुष्ठ रोग फाउंडेशन (एसआईएलएफ) जैसे संगठन शामिल थे। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा जैसे पांच उच्च प्राथमिकता वाले राज्यों के प्रतिनिधियों ने विचार-विमर्श में भाग लिया और जमीनी स्तर के अपने अनुभव साझा किए।